धरती पकड़ निर्दलीय

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धरती पकड़ निर्दलीय
धरती पकड़ निर्दलीय
लेखक रवीन्द्र प्रभात
प्रकाशक हिन्द युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली, भारत
प्रकाशन तिथि 2013
ISBN 9789381394519/ISBN 9381394512
पृष्ठ: 168 पृष्ठ (प्रथम संस्करण)
शैली व्यंग्यात्मक उपन्यास
विषय स्थानीय भारतीय राजनीति को केंद्र में रखकर लिखा गया व्यंग्य उपन्यास।
विधा उपन्यास
प्रकार प्रिंट (पेपर बैक)

धरती पकड़ निर्दलीय हिन्दी का एक व्यंग्यात्मक उपन्यास है, जो रवीन्द्र प्रभात द्वारा लिखित है । यह उपन्यास भारतीय राजनीति में ग्रामीण चौपाल की भूमिका पर आधारित है । [१]

सारांश[सम्पादन]

व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है की वो व्यंग्य ही लगे। इधर का अधिकांश व्यंग्य लेखन व्यंग्य नहीं लगता। उसमें हास्य की अधिकता होती है या वो ललित निबन्ध बन जाता है। विशुद्ध व्यंग्य बहुत कम नज़र आता है। लेकिन रवीन्द्र प्रभात के व्यंग्यों से गुजरते हुए महसूस होता है कि हम विशुद्ध व्यंग्य ही पढ़ रहे हैं, कुछ और नहीं। जो लोग कह रहे हैं की व्यंग्य मर रहा है, उन्हें यह कृति सोचने पर मजबूर कर देती है, कि व्यंग्य ज़िंदा है, धारदार है और संभावनाओं से भरा हुआ है।

गिरीश पंकज : पुस्तक की भूमिका में"[२]

इस पुस्तक में गाँव की चौपाल के माध्यम से लेखक ने पूरे देश का दृश्य उपस्थित किया है। धरतीपकड़ निर्दलीय का चरित्र गढ़ कर उन्होने देश के हर मोर्चे की खबर ली है। व्यंग्य मे इस्तेमाल में लोकभाषा के कारण व्यंग्य का आस्वाद बढ़ गया है। ग्रामीण परिवेश की चौपालों में अक्सर जीवन-जगत की तरह-तरह की चर्चाएँ होती रहती है और यह तय है कि इन चर्चाओं मे जीवंत व्यंग्य के तड़के भी खूब होते है। लेखक ने अपने हर धारावाहिक मे व्यंग्यमय संवादों की बानगी परोसी है। लेखक ने महंगाई, राजनीति, मिलावट, क्रिकेट, बालीवुड, अन्ना-रामदेव, शिक्षा व्यवस्था चुनाव, लोकपाल, जातिवाद जैसे अनेक सामयिक मुद्दों पर चौपाल के माध्यम से करार व्यंग्य किया है। हर कड़ी में व्यंग्य से पेज संवाद है। जिन्हें पढ़ कर बरबस रागदरबारी की याद ताज़ा हो जाती है। धारावाहिकों की ये कड़ियाँ मिल कर एक तरह के प्रयोगधर्मी उपन्यास की शक्ल भी ले लेती हैं। पाठक को लगता है की वह उपन्यास ही पढ़ रहा है। जिस तरह हर एक कड़ी आपस मे इंटरलिंकिंग होती है, उससे घटनाक्रम भी आगे जता है और धरतीपकड़ निर्दलीय की चुनाव लड़ने की इच्छा भी बलवती होती जाती है। लेकिन वो चुनाव जीत नहीं पाते क्योंकि जो मत और मत पेटियां लूट नहीं सकता, वो नेता नहीं बन सकता और अंत में निर्दलीय जी यही कह कर संतुष्ट हो लेते हैं कि -"हमारा बढ़ईपुरवा ही हमारा देश है। चौपाल विधानसभा और संसद भवन है।"[३]

धारावाहिक के सारे अंश पठनीय है। अनेक संवाद ऐसे हैं जो लोगों को याद रह जाएँगे। सबका उल्लेख तो यहाँ संभव नहीं लेकिन कुछ की बानगी पेश करने का मन कर रहा है। जैसे, हम सबको चाहिए एकता, अउर नेतवन को चाहिए अनेकता।, सब तीरथ बार-बार तिहाड़ जेल एक बार, बेशर्मी न हो तो नेता कैसा, देश अब सचमुच भ्रस्टन के देश होई गवा है, नेता बोले बार-बार, जनता बोले एक बार,पीट रहे हैं ढोल, हिंदी है अनमोल, नेता को नहीं दोष गुंसाई, और सौ मे निन्यानवे बेईमान फिर भी हो रहा भारत निर्माण[४]

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. धरती पकड़ निर्दलीय, लेखक - रवीन्द्र प्रभात, प्रकाशक-हिन्द युग्म , 1, जिया सराय,हौज खास, नई दिल्ली-110016, भारत, वर्ष- 2013, आई एस बी एन 9381394512, , आई एस बी एन 9789381394519
  2. व्यंग्य की धारदार भाषा की उपस्थिति दर्ज कराती पुस्तक
  3. हिन्दी बूक सेंटर पर पुस्तक का विवरण
  4. अपनी माटी (वेब पत्रिका), नवंबर 2013,डॉ राम बहादुर मिश्र की समीक्षा, शीर्षक: व्यंग्य की धारदार भाषा है 'धरतीपकड़ निर्दलीय' उपन्यास में

बाह्य स्त्रोत[सम्पादन]